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Saturday, September 3, 2011

सनल एडमरूकु : मदर टेरेसा का भारत में योगदान - एक दिखावा


मदर टेरेसा का भारत में योगदान - एक दिखावा


सनल एडमरूकु
प्रेसीडेंट
इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन & रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल

भारत, विशेष रूप से कलकत्ता के ग़रीब लोगों के लिये  मदर टेरेसा का महान योगदान रहा है| उनके इन अच्छे कार्यों के लिए उन्हें प्रसिद्ध कैथोलिक, एक नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और साधवी की उपाधि से सम्मानित किया गया | सनल एडमरूकु( सेक्रेटरी जनरल ऑफ  इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन आंड प्रेसीडेंट ऑफ रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल) का कहना है  कि , “ उनके भारत के लिए किये गये कार्यों का वास्तविक  मूल्यांकन  किया जाये तो मुझे एसा कोई  कारण  दिखाए नही देता है जिसके लिए देशवासी उनके आभारी  रहें”|

मदर टेरेसा ने  एक  खूबसूरत, दिलचस्प, जीवंत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारतीय महानगर कलकत्ता को  गंदगी, दुख, निराशा, और मौत का नाम दिया | ये शहर उनके इस  बहुत ही खास धर्मार्थ कार्य के लिए प्रसिद्ध पृष्ठभूमि बन गया| उनका संगठन कलकता के उन २००  संगठनों में से एक था जो वहाँ  के स्लम निवासियों की मदद करने और उनका बेहतर भविष्य का निर्माण करने  सामने आये | यह स्थानीय स्तर पर बहुत  सक्रिय दिखाई नहीं दिया, लेकिन उनके  स्लम स्कूल के  ५०००  बच्चों की बेबुनियाद कहानी से उनकी संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय प्रचार में  लाया गया |
मदर टेरेसा ने भारत की ग़रीबी के नाम पर लाखों डालर (कुछ लोगों का कहना अरबों) एकत्र किया,  यह सब पैसे कहाँ गए?  जिस कार्य के लिए इस धन राशि को एकत्र किया गया निश्चित रूप से इसका सही उपयोग नही हुआ | उनके आश्रम में  पीड़ितों  को केवल कुछ कटोरे सूप ,थोड़ी सी देखभाल और आश्रय दिया जाता था | दुनिया में धनी वर्ग भी  उदार नहीं है,वो भी ग़रीबी को आकर्षण बना कर रखना चाहता है | मदर टेरेसा कहती थी “ग़रीबों का दर्द बहुत सुंदर है और इस दर्द और पीड़ा के इस उदाहरण से पूरी दुनिया को आध्यात्मिक स्तर पर लाभ हो रहा है”| क्या हमें एक सनकी अरबपति के इस व्याख्यान के लिए आभारी होना चाहिए |

उनके आश्रम में लोगों को इसलिये लाया जाता था ताकि दुनिया देख कर आँसू बहा सके | तथापि वास्तविकता शर्मनाक है: छोटे छोटे घर जहाँ इतनी भीड़ रहती थी कि  कई रोगियों को एक  दूसरों के साथ  बिस्तर साझा करना पड़ता था यद्यपि वहाँ कई तपेदिक, एड्स और अन्य अत्यधिक संक्रामक बीमारियों से पीड़ित मरीज थे, फिर भी स्वच्छता की कोई चिंता नहीं थी | रोगियों को अच्छे शब्दों, अपर्याप्त पुरानी दवाओं, पुराने सुइयाँ (जो गुनगुने पानी में धो ली जाती थी) से इलाज़ किया जाता था |  खुले घाव ,कराहते रोगी जिन्हे  दर्दनिवारक दवाइयाँ भी  नही दी जाती थी उनके आश्रम  में देखे जा सकते थे| यहाँ तक दर्दनिवारक दवाइयाँ तो गंभीर बीमारियों में भी नही दी जाती थी | मदर टेरेसा के अनुसार, "एक व्यक्ति के लिए सबसे सुंदर उपहार है कि वह मसीहा के दुखों में  भागीदार  बन सके "| एक बार जब  पीड़ित जो दर्द से कराह रहा था था  तो उसे दिलासा देते हुये उन्होने कहा  : "आप पीड़ित हैं, इसका मतलब है कि यीशु आप को चुंबन दे रहे हें!" तो  दर्द से पीड़ित आदमी गुस्से से चिल्लाता है: " अपने यीशु को कहो कि वो चुंबन नही करे" क्या हमें इस तरह के दान के आभारी होना चाहिए ?क्या हमें ये बर्दाश्त करना चाहिए कि अज्ञानी और असहाय लोगों के साथ धर्म की ओट पर उनकी पीड़ा को मसीहा से जोड़ कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाये?

मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरूस्कर प्राप्त हुआ, तो ओस्लो में दुनिया भर में अपना भाषण प्रसारित करने का उन्हे अवसर मिला | अपने भाषण में उन्होंने  गर्भपात को दुनिया की सबसे बड़ी बुराई बताई और जनसंख्या नियंत्रण के खिलाफ मुहिम छेड़ने का बीड़ा उठाया | उन्होंने ये माना की उनका धर्मार्थ कार्य गर्भपात और जनसंख्या नियंत्रण के खिलाफ बड़ी लड़ाई का हिस्सा हे | यह कट्टरपंथी स्थिति भारत और अन्य तीसरी दुनिया के देशों के चेहरे में एक तमाचा है, जहां जनसंख्या नियंत्रण देश के विकास, प्रगति और सामाजिक परिवर्तन की मुख्य कुंजी है | क्या हमें मदर टेरेसा के लिए आभारी होना चाहिए? जिन्होंने दुनिया भर में  हमारे खिलाफ प्रचार करके, हमारे नाम से पैसे एकत्र किए |

कलकत्ता में मदर टेरेसा गरीबों की सेवा नहीं कर रही थी, परोक्ष रूप से वह पश्चिम में समृद्ध लोगों के लिए कार्य कर रहीं थी | वह उन अरबों डालर का दान लेकर उन समृद्ध लोगों की बुरी अंतरात्मा पर काबू पाने में मदद कर रहीं थीं | कई तानाशाही और अपराधी भी अपने कुच्छित कार्यों पर परदा डालने के लिए उनकी  मदद करते थे | मदर टेरेसा उनके लिए पूजनीय थीं |तथापि अधिकांश समर्थक अच्छे इरादे और  गर्म दिल के भी थे, जिन्हे ये भ्रम था कि वह "सैंट ऑफ दा गटर" हें ,जिन्होंने सबके आँसू पोंछे और उनके सब दुख दूर करे और उन्हे न्याय दिलाया| जो उन्हें प्यार करते हैं वो उनकी हकीकत को स्वीकार करने कतई तैयार नही है |
                                                                                                    हिन्दी अनुवादक : दीपाली सिन्हा

1 comment:

Kumar said...

lagta hai lakho logo ke sath noble prize de wale bhee bevkoof the aur ek maatra budhimaan sanal edmaruku hi hamare desh me paaye jate hain