Visit http://youtube.com/rationalists

Loading...

Saturday, September 3, 2011

सनल एडमरूकु: सत्य साई बाबा


सत्य साई बाबा के बिना भारत  एक बेहतर जगह हो गया होता

सनल एडमरूकु
प्रेसीडेंट
इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन & रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल
प्रकाशन ऑनलाइन: अप्रेल २६, २०११

आज सुबह जब (२४ अप्रैल २०११) सत्य साईं बाबा का ८५ साल की उम्र में निधन हो गया, तो एक बार फिर उनका चमत्कार और भविष्यवाणी विफल साबित हुई| उन्होंने सन् २००० में पुट्तपरती में स्थित  अपने मुख्यालय में,एक सार्वजनिक सभा में भविष्यवाणी की थी  कि वह  ९६ वर्ष की उम्र में ही मरेंगे  | और आखिरी क्षण तक, उनके भक्त एक चमत्कार का इंतज़ार करते रहे |उनकी म्रत्यु उनके गुमराह भक्तों के लिए एक सबक है |

De mortuis nihil nisi bene कहा जाता है  "मृतकों को अच्छा कुछ नहीं कह सकते तो बेहतर है कुछ नही बोलो ".  लेकिन मुझे लगता है कि  सत्य साई बाबा  इसके  अपवाद हैं| उन्‍होंने देश के लिए जो किया है वह एक महान् क्षति है | उनके हानिकारक प्रभाव से  वैज्ञानिक  सोच पर एक भारी झटका लगा है |  एक समय था जब वैज्ञानिक प्रगति हमारे अच्छे समाज और आर्थिक उन्नति का कारण बनने लगी थी , और वैज्ञानिक जागृति  भारत भर में फैलनी  शुरू हो गयी थी  सत्य साई बाबा का अंधविश्वास   एक "काउंटर  क्रांति" था ,जिसे गैर जिम्मेदार नेताओं और लोंगों ने साथ दिया | मेरे हिसाब से  यह  सबसे बड़ा अपराध है |मैं एक बार फिर  उनकी धोखाधड़ी को सार्वजनिक रूप से उजागर करने  में सफल रहा  हूँ | इसके बाद कई तर्कशास्त्री भी इस मुद्दे पर आगे आए |  ऐसा नही है की उन पर  सिर्फ़  कई  अपराधिक  आरोप लगाए गये हों  कथित तौर पर यौन शोषण और हत्या के कई मामलों की अभी  जांच  जारी  है,  लेकिन  अपने राजनीतिक सरंक्षण  के  कारण उन्हे अब तक उनके अपराधों के खिलाफ जिम्मेदार नहीं ठहराया गया |  उनके साम्राज्य के वित्तीय आँकड़ों  का उल्लेख भी  किसी के पास  नहीं है |

सत्य साईं बाबा गंभीरता से इस बात को कहते थे  कि वह भगवान है और, ब्रह्मांड  के निर्माता है, और छोटे बड़े 'चमत्कार'  के   साथ अपने देवत्व को  "साबित" करते रहते थे|  गांव के तांत्रिक के बेटे होने के कारण वे  हाथ की सफाई  से भी परिचित थे |  यदद्पि अपने धोखाधड़ी प्रदर्शन से ना केवल  गरीब और अशिक्षित ग्रामीणों को  मोहित किया बल्कि इन वर्षों में, वह  मंत्रियों,  प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, शीर्ष उद्योगपतियों , सुपरस्टार  भारत के अमीर और ताक़तवरों को आकर्षित  करने में भी  कामयाब रहे |
सत्या  साई बाबा का  काम करने का एक विशेष ढंग था जिसके कारण उन्हे लोगों के बीच  भारी दबदबा बनाए रखने मैं   आश्चर्यजनक सफलता  मिली |  बहुत सारे उच्च समाज भक्त अपने निहित स्वार्थ के कारण उनके साथ आये , तो बहुत  उनके साथ  इसलिये शामिल हो गए है क्योंकि यह  एक शक्तिशाली क्लब की तरह था जो सभी राजनीतिक प्रणाली पर अपना जाल फेला  कर  काम कर रहा था |  कई लोगों के लिए यह शीर्ष  नौकरी पाने के लिए एक रास्ता था तो कई  को बेईमानी से मिले  काले धन से छुटकारा प्राप्त करने का रास्ता था | उनके साम्राज्य पर यह आरोप लगाया जाता है,कि वे  विदेशी भक्तों के मध्यम से काले धन को वैध किया करते थे | यह भी एक आश्चर्य कि बात है साई बाबा तेलुगु के अलावा किसी अन्य भाषा मैं बोलते नहीं थे लेकिन  अपने पूरे जीवन में केवल एक बार विदेश यात्रा पर गये - युगांडा में अपने दोस्त ईदी अमीन से मिलने |

अपने ८० वें जन्मदिन पर साई बाबा के समर्थकों ने सारी दुनिया के सामने उन्हे एक चमत्कारी  आदमी से एक परोपकारी संत के रूप में प्रस्तुत किया | ये इसलिए हुआ क्यूंकी अक्सर मैं अपने  टीवी शो में उनके  चमत्कार का  प्रदर्शन किया करता था और धीरे धीरे सड़कों में भी कई बच्चे उनकी  नकल करते देखे जाने लगे | इसके बाद कि सारी ज़िंदगी संत का चोला पहन कर गैर सामाजिक  कार्यों को अंजाम देते रहे | 

बाद में उन्होंने अपने पुश्तैनी गांव के चारों ओर  सामाजिक विकास कारया ,अस्पताल खुलवाए ,ग़रीबों के लिए स्कूल और पेयजल  परियोजनाए आदि सामाजिक काम करके लोगों के बीच संत के रूप में उपस्थित हुए , हो सकता है ये सामाजिक कार्य ग़रीबों के लिए उपयोगी हों लैकिन इस तरह के परोपकारी कार्य तो माफिया मलिक भी करते हैं|  इन अच्छे कार्य को उनके अपराधों  और  भारतीय समाज के लिए किए गये नुकसान के खिलाफ  नहीं तौला जा सकता है |

दिसंबर 2005 में मैने तत्कालीन राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम,जो कि साई बाबा के उत्साही समर्थकों में से एक है, एक पत्र लिखा था ,जिसका आज तक जवाब नही आया| पत्र में मैंने साई बाबा के  अपराधिक  जांच की मांग की थी |यह भी लिखा था कि  उनके  सामाजिक विकास परियोजनाओं के लिए किए गये काम के कारण अगर  उनके  अपराधों को  सरंक्षण दे दिया गया है, तो यह प्रक्रिया अस्वीकार्य है|  यह भारत के लिए शर्म की बात है कि क़ानून  भी   बिना किसी  जांच के साई बाबा के खिलाफ आरोपों और गवाहों की अनदेखी कर  रहा हैं | क्या  हमारा क़ानून  भगवा वस्त्र धारी  अपराधी  के लिए अछूत है?  क्या  हमे ये  बर्दाश्त करना चाहिए  कि राजनीतिक संरक्षणवाद इतनी निर्भीकता से सिर उठाता रहे ? ये  भारत के लोकतंत्र का  मजाक है |

सत्य साईं बाबा भारत के लिए एक महान क्षति का कारण  है| उनके गैर जिम्मेदाराना राजनीतिक संरक्षक  भारत की राजनीतिक संस्कृति को भ्रष्ट करती है| सत्य साई बाबा के चमत्कार से उत्साहित हो कर एक नया समुदाय उनका अनुगमन करने लगा है| आज  भारत सत्य साई बाबा के बिना कुछ और  बेहतर  हो गया होता |

हिन्दी अनुवादक: दीपाली सिन्हा

एक भारतीय जो धूप पर जीवित है
प्रहलाद जानी  जिनका दावा है कि वो वर्षों से  अन्न जल ग्रहण किए बिना जीवित हैं,
उनके इस दावे को उन लोंगों ने साथ दिया जो इसकी सच्चाई से अच्छी तरह से वाकिफ़ थे|
सनल एडमरूकु
प्रेसीडेंट
इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन & रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल

Prahlad Jani

जब से अंबे माँ ने अपनी उंगली से मेरी जीभ को छुआ है तब से मैने कभी भी खाने और पानी को हाथ  नही लगाया है-ये दावा उस व्यक्ति का है जिसका नाम है पहलाद जानी |

जैविक नियमों के अनुसार कोई भी मानव और  जानवर  भोजन और पानी के नियमित सेवन  के बिना जीवित नही रह सकता | उनका यह दावा धर्म से जुड़ा होने के कारण लोकप्रिय हुआ | इस तरह के मामले पहले  भी सामने आये हैं, लैकिन पहलाद जानी  का मामला इसलिये प्रकाश मैं आया क्यूंकी कई प्रभावशाली लोग उनके साथ थे |

न्यूरोलॉजिस्ट और अहमदाबाद के  स्टर्लिंग अस्पताल के प्रमुख डा. सुधीर शाह, पहले व्यक्ति थे जो प्रहलाद जानी की मूर्खतापूर्ण  कहानी को सुर्खियों में लाए | सनसनीखेज "वैज्ञानिक" अनुसंधान परियोजना में, वे और उनकी  टीम २२ अप्रैल और ६ मई के बीच इस मामले पर चिकित्सा जांच करने पहुँची | इस परियोजना को  भारतीय शरीर विज्ञान और संबद्ध विज्ञान रक्षा संस्थान (डीआईपीएएस),  रक्षा अनुसंधान और विकास  संगठन की एक शाखा की देखरेख के द्वारा किया गया था | डीआईपीएएस निर्देशक गोविंद स्वामी  इलवज़्गन भी डा . सुधीर शाह का साथ दे रहे थे| बाद मैं दोनो ने संयुक्त रूप से इस बात की पुष्टि की,  कि  १५  दिनों के  पर्यवेक्षण  के  दौरान जानी ने  एक  अन्न का दाना  भी नही खाया  और सबसे  महत्वपूर्ण बात ये है कि इस दौरान उन्होने  पानी की एक बूंद भी नहीं पी  - जो पूरी तरह  से असंभव लगता है| क्या ये वैज्ञानिक एक एसे आदमी के दावे को, जो जीव विज्ञान के  बुनियादी कानूनों को बेबुनियाद साबित कर रहा है, सलामी देंगे? जब जानी अपनी  प्यास बुझते थे तब क्या उन्होने अपनी आँखे (पूरे समय सीसीटीवी कैमरा चल रहा था) बंद कर रखी थी? इसमें कोई शक नहीं है कि " संपूर्ण अवलोकन " में  कमियां थी और "महान वैज्ञानिक परीक्षण"  एक तमाशा था |

जब परीक्षण चल रहा था, मैंने  इंडिया टीवी के  एक लाइव कार्यक्रम में कुछ  खामियों को उजागर किया : एक  अधिकारिक  वीडियो क्लिप  से पता चला  कि  कभी कभी जानी  सीसीटीवी कैमरे के क्षेत्र  से बाहर जाया करते थे | क्योकि उन्हे  भक्तों से मिलने की अनुमति  थी और सूर्य  स्नान के समय  परीक्षण  कमरा  छोड़ सकते थे| उनके  नियमित रूप से किए गये कुल्ला और स्नान गतिविधियों पर  निगरानी ठीक से नही रखी गयी थी |मैने  एक  बुद्धिवादी विशेषज्ञ दल के  साथ  परीक्षण व्यवस्था की जाँच करने  का अवसर माँगा था ,पर  अहमदाबाद से तत्काल कोई भी प्रतिक्रिया नही मिली |  अचानक स्टर्लिंग अस्पताल से  मुझे आमंत्रित किया गया - लाइव  टीवी पर  - अगले दिन की प्रक्रिया (परीक्षा) में  शामिल होने के लिये |

सुबह जब हम  गुजरात के लिए उड़ान भरने  तैयार थे, सूचित किया गया कि अभी हमें  परियोजना के प्रमुख अधिकारी की अनुमति का इंतजार करना पड़ेगा | और ये कहने की जरूरत नहीं है : कि ये अनुमति कभी नहीं आई |

इसी तरह, हम नवंबर  २००३  में डा शाह के प्रथम  परीक्षण में भी  भाग लेने में  असमर्थ रहे थे| डा शाह जिनके पास पहलाद जानी पर किए गये अध्ययनों का एक लंबा रिकॉर्ड है| जिसकी अब तक किसी भी वैज्ञानिक पत्रिका में चर्चा नहीं की गयी है| वे  केवल  अपने इस  धूप सिद्धांत को साबित करने की कोशिश करते रहे : कि मनुष्य खाने और पीने के अलावा किसी  अन्य ऊर्जा स्रोतों से भी जिंदा रह सकता है, उसमे से एक है सूरज की रोशनी | प्रहलाद जानी डा शाह का पहला मामला नही था २०००-२००१ में, उन्होने एक वर्ष से भी अधिक समय तक हीरा  मानेक पर परीक्षण किया था और  अपने दावे की पुष्टि की, कि वह सिर्फ़  धूप ख़ाता है(और कभी कभी  थोड़ा सा पानी)|  शाह के इस अनुसंधान को  नासा और पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय द्वारा जांच किया गया था| जिसको अधिकारिक तौर पर अस्वीकार  कर दिया था |

डा. शाह कट्टर जैनी थे और भारतीय जैन डाक्टर 'फेडरेशन (ज्ड़फ), के अध्यक्ष भी थे| उन्होने यह प्रस्ताव रखा कि भगवान महावीर की ' महाविज्ञान '  द्वारा चिकित्सा तथ्यों को अत्याधिक बारीकी से प्रकट किया गया है, और  अनुसंधान के द्वारा जैन धारा के अंतर्गत उसी दिशा में अपूर्ण चिकित्सा विज्ञान पर कार्य किया जा सकता है| हमे केवल आश्चर्य ये है कि धार्मिक आस्था  के कारण क्या उनकी  शोधकर्ता आँखों के आगे कभी कभी बादल घिर जाते हैं | दिलचस्प है, उनकी टीम के कई  सदस्य जैनी  हैं , और हीरा मानेक परीक्षण में भी उनके साथी ज्ड़फ के एक पूर्व अध्यक्ष थे|

शाह ने यह भी  सुझाव दिया कि यह  धूप सिद्धांत संभवतः सेनिकों के लिये उपयोगी  हो सकता है |  और ये शर्म की बात होगी कि भारतीय रक्षा मंत्रालय इस सुझाव को मान लेगी |क्या हम सेना को  धूप आहार देने पर विचार करने लगेगें | ये जानने के लिए हम भी इच्छुक हैं |
                                                                                          
 हिन्दी अनुवादक : दीपाली सिन्हा

सनल एडमरूकु : मदर टेरेसा का भारत में योगदान - एक दिखावा


मदर टेरेसा का भारत में योगदान - एक दिखावा


सनल एडमरूकु
प्रेसीडेंट
इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन & रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल

भारत, विशेष रूप से कलकत्ता के ग़रीब लोगों के लिये  मदर टेरेसा का महान योगदान रहा है| उनके इन अच्छे कार्यों के लिए उन्हें प्रसिद्ध कैथोलिक, एक नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और साधवी की उपाधि से सम्मानित किया गया | सनल एडमरूकु( सेक्रेटरी जनरल ऑफ  इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन आंड प्रेसीडेंट ऑफ रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल) का कहना है  कि , “ उनके भारत के लिए किये गये कार्यों का वास्तविक  मूल्यांकन  किया जाये तो मुझे एसा कोई  कारण  दिखाए नही देता है जिसके लिए देशवासी उनके आभारी  रहें”|

मदर टेरेसा ने  एक  खूबसूरत, दिलचस्प, जीवंत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारतीय महानगर कलकत्ता को  गंदगी, दुख, निराशा, और मौत का नाम दिया | ये शहर उनके इस  बहुत ही खास धर्मार्थ कार्य के लिए प्रसिद्ध पृष्ठभूमि बन गया| उनका संगठन कलकता के उन २००  संगठनों में से एक था जो वहाँ  के स्लम निवासियों की मदद करने और उनका बेहतर भविष्य का निर्माण करने  सामने आये | यह स्थानीय स्तर पर बहुत  सक्रिय दिखाई नहीं दिया, लेकिन उनके  स्लम स्कूल के  ५०००  बच्चों की बेबुनियाद कहानी से उनकी संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय प्रचार में  लाया गया |
मदर टेरेसा ने भारत की ग़रीबी के नाम पर लाखों डालर (कुछ लोगों का कहना अरबों) एकत्र किया,  यह सब पैसे कहाँ गए?  जिस कार्य के लिए इस धन राशि को एकत्र किया गया निश्चित रूप से इसका सही उपयोग नही हुआ | उनके आश्रम में  पीड़ितों  को केवल कुछ कटोरे सूप ,थोड़ी सी देखभाल और आश्रय दिया जाता था | दुनिया में धनी वर्ग भी  उदार नहीं है,वो भी ग़रीबी को आकर्षण बना कर रखना चाहता है | मदर टेरेसा कहती थी “ग़रीबों का दर्द बहुत सुंदर है और इस दर्द और पीड़ा के इस उदाहरण से पूरी दुनिया को आध्यात्मिक स्तर पर लाभ हो रहा है”| क्या हमें एक सनकी अरबपति के इस व्याख्यान के लिए आभारी होना चाहिए |

उनके आश्रम में लोगों को इसलिये लाया जाता था ताकि दुनिया देख कर आँसू बहा सके | तथापि वास्तविकता शर्मनाक है: छोटे छोटे घर जहाँ इतनी भीड़ रहती थी कि  कई रोगियों को एक  दूसरों के साथ  बिस्तर साझा करना पड़ता था यद्यपि वहाँ कई तपेदिक, एड्स और अन्य अत्यधिक संक्रामक बीमारियों से पीड़ित मरीज थे, फिर भी स्वच्छता की कोई चिंता नहीं थी | रोगियों को अच्छे शब्दों, अपर्याप्त पुरानी दवाओं, पुराने सुइयाँ (जो गुनगुने पानी में धो ली जाती थी) से इलाज़ किया जाता था |  खुले घाव ,कराहते रोगी जिन्हे  दर्दनिवारक दवाइयाँ भी  नही दी जाती थी उनके आश्रम  में देखे जा सकते थे| यहाँ तक दर्दनिवारक दवाइयाँ तो गंभीर बीमारियों में भी नही दी जाती थी | मदर टेरेसा के अनुसार, "एक व्यक्ति के लिए सबसे सुंदर उपहार है कि वह मसीहा के दुखों में  भागीदार  बन सके "| एक बार जब  पीड़ित जो दर्द से कराह रहा था था  तो उसे दिलासा देते हुये उन्होने कहा  : "आप पीड़ित हैं, इसका मतलब है कि यीशु आप को चुंबन दे रहे हें!" तो  दर्द से पीड़ित आदमी गुस्से से चिल्लाता है: " अपने यीशु को कहो कि वो चुंबन नही करे" क्या हमें इस तरह के दान के आभारी होना चाहिए ?क्या हमें ये बर्दाश्त करना चाहिए कि अज्ञानी और असहाय लोगों के साथ धर्म की ओट पर उनकी पीड़ा को मसीहा से जोड़ कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाये?

मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरूस्कर प्राप्त हुआ, तो ओस्लो में दुनिया भर में अपना भाषण प्रसारित करने का उन्हे अवसर मिला | अपने भाषण में उन्होंने  गर्भपात को दुनिया की सबसे बड़ी बुराई बताई और जनसंख्या नियंत्रण के खिलाफ मुहिम छेड़ने का बीड़ा उठाया | उन्होंने ये माना की उनका धर्मार्थ कार्य गर्भपात और जनसंख्या नियंत्रण के खिलाफ बड़ी लड़ाई का हिस्सा हे | यह कट्टरपंथी स्थिति भारत और अन्य तीसरी दुनिया के देशों के चेहरे में एक तमाचा है, जहां जनसंख्या नियंत्रण देश के विकास, प्रगति और सामाजिक परिवर्तन की मुख्य कुंजी है | क्या हमें मदर टेरेसा के लिए आभारी होना चाहिए? जिन्होंने दुनिया भर में  हमारे खिलाफ प्रचार करके, हमारे नाम से पैसे एकत्र किए |

कलकत्ता में मदर टेरेसा गरीबों की सेवा नहीं कर रही थी, परोक्ष रूप से वह पश्चिम में समृद्ध लोगों के लिए कार्य कर रहीं थी | वह उन अरबों डालर का दान लेकर उन समृद्ध लोगों की बुरी अंतरात्मा पर काबू पाने में मदद कर रहीं थीं | कई तानाशाही और अपराधी भी अपने कुच्छित कार्यों पर परदा डालने के लिए उनकी  मदद करते थे | मदर टेरेसा उनके लिए पूजनीय थीं |तथापि अधिकांश समर्थक अच्छे इरादे और  गर्म दिल के भी थे, जिन्हे ये भ्रम था कि वह "सैंट ऑफ दा गटर" हें ,जिन्होंने सबके आँसू पोंछे और उनके सब दुख दूर करे और उन्हे न्याय दिलाया| जो उन्हें प्यार करते हैं वो उनकी हकीकत को स्वीकार करने कतई तैयार नही है |
                                                                                                    हिन्दी अनुवादक : दीपाली सिन्हा